सोशल मीडिया और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

Posted on 07 Oct 2017 -by Watchdog

प्रो.जगदीश्वर चतुर्वेदी- 

सोशल मीडिया ने माध्यमों की दुनिया बदल दी है।साथ सभी किस्म की राजनीतिक, सांस्कृतिक औरआर्थिक संरचनाओं को गहरे तक प्रभावित किया है। सोशलमीडिया के अनेक रूप प्रचलन में हैं , जैसे -फेसबुक, ब्लॉगिंग,जी प्लस , ट्विटर आदि। सोशलमीडिया में ‘सोशल’ पदबंध बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह सामाजिक से भिन्न है। समाज विज्ञान से लेकर लेकर परंपरागत विमर्श के विभिन्न क्षेत्रों में १८वीं शताब्दी के बाद से लेकर आज तक जिसे सामाजिक कहते रहे हैं उससे इस ‘सोशल’ का कोई लेना- देना नहीं है.

सवाल यह है ‘सोशल’ को कैसे परिभाषित करें। ‘सोशल’ के कई रूप हैं। राजनीतिक संप्रेषण से लेकर मार्केटिंग तक इसके वैविध्यपूर्ण रूप नजर आते हैं। सोशलमीडिया में जो ‘सोशल’ है वह सामाजिक जिम्मेदारी के विचारों से भागा हुआ यूजर है।सोशल नेटवर्क में सामाजिक जिम्मेदारी का भाव कम है, हमें सामाजिक विकास के लिए ऐसे विकल्प चाहिए जो सामाजिक जिम्मेदारी निभाएं।सामाजिक जिम्मेदारी निभाने के लिए ‘भरोसेमंद’ और ‘विश्वसनीय’ नेटवर्क की जरूरत है।हमें आज और सोशलाइजेशन की जरूरत नहीं है बल्कि भरोसेमंद और विश्वसनीय लोगों के नेटवर्क की जरूरत है, क्योंकि सोशलमीडिया में बहुत कुछ ऐसा कंटेंट है, कम्युनिकेशन है जो भरोसे लायक नहीं है, समाज के लिए हितकारी नहीं है।

हममें से कोई भीड़ का अंग बनना नहीं चाहता, ‘भीड़’ में बोलना नहीं चाहता।लेकिन सोशलमीडिया में तो सबकुछ ‘मास’ है,’भीड़’ है।सोशलमीडिया में ज्योंही दाखिल होते हैं ‘भीड़’ का अंग बन जाते हैं। सोशलमीडिया में ‘मास’ ही शक्ति है। भीड़ ही ताकतवर है।

ज्यां बौद्रिलार्द के शब्दों में कहें तो ‘सोशल’ का यथार्थ में रूपान्तरण ‘सामाजिक’ के रूप में नहीं होता। वह खोखला है।जिसे हम ‘मास’ कहते हैं वह खोखला पदबंध है।यह एक तरह से क्रिस्टल वॉल की तरह है।बौद्रिलार्द ने’मास’ को ‘बहुसंख्यक’ के रूप में देखा है।’मासेज’ से की गयी अपील का कोई प्रत्युत्तर नहीं मिलता।’मासेज’ पदबंध में राज्य,इतिहास,संस्कृति आदि सभी विचार हजम हो जाते हैं।’मासेज’ हमारी आधुनिकता का सबसे विस्फोटक फिनोमिना है।इसमें आप किसी भी किस्म की परंपरागत थ्योरी और अभ्यासों को समाहित नहीं कर सकते।’मासेज’ के दो रूप मिलते हैं, पहला, स्वत:स्फूर्त्त, दूसरा पेसिव। लेकिन यह हमेशा संभावित ऊर्जा से भरी रहता है।आज वे चुप हैं लेकिन कल वे जब बोलेंगे तो ‘साइलेंट मेजोरिटी’ कहे जाएंगे। इतिहास में ‘मासेज’ का कोई इतिहास नहीं होता।उनका कोई अतीत और भविष्य भी नहीं होता।उनके पास कोई वर्चुअल एनर्जी भी नहीं होती जिसे वे रिलीज कर सकें।लेकिन उसमें हजम करने या तटस्थ करने की क्षमता होती है 

बौद्रिलार्द का मानना है ‘मास’ या ´भीड़´कोई अवधारणा नहीं है।बल्कि राजनीतिक भाषणकला का अंग है। यह हल्का,रूढ़ और लुंपन पदबंध है।प्रत्येक खोखले वक्ता के पास अनुगामी गूंगा समूह होता है। जिसकी कोई निजी राय नहीं होती।वह सभी किस्म के विमर्शों में सारहीन रूप में भाग लेता है। ´भीड़’ का अर्थ है ‘सोशल’ का पूरी तरह सफाया। ‘भीड़’ के प्रसंग में ‘भक्त’ और ‘भगवान’ की इमेज को नए सिरे से पढ़ने की जरूरत है। इन दोनों की इमेज में कोई अर्थ संप्रसारित नहीं होता। कोई विचार संप्रसारित नहीं होता।’भक्त’ कभी भगवान के विचार से प्रभावित नहीं होते।ज्योंही ‘भगवान’ की याद आती है पुजारी याद आता है।उस समय आप न तो पाप पर गुस्सा होते हैं और न व्यक्तिगत मुक्ति के सवालों पर गुस्सा होते हैं।

मंदिरों और तीर्थों में संस्कार देखते हैं ,यह रूपान्तरण की धारणा का विलोम है। वे अंतत:भक्त हैं , वे छोटी छोटी इमेजों के जरिए जिन्दा रहते हैं।वे इमेजों में किए गए छोटे छोटे बदलावों और अंधविश्वासों के जरिए जिंदा रहते हैं।इसके क्रम में वे पतनशील संस्कारों को बनाए रखते हैं। आध्यात्मिक आस्था के भिखारी के रूप में बचे रहते हैं। वे आस्था के लिए मरना नहीं चाहते।वे रूपान्तरित भी होना नहीं चाहते।उनकी अनिश्चितता,अविश्वास ,भेदभाव और इंतजार कभी खत्म नहीं होता।वे हर चीज से पलायन करते हैं और यही चीज उनको धर्म से जोड़े रखती है। मासेज के लिए भगवान सब समय हैं और हर जगह हैं।उनकी अनंत इमेज हैं।उन अनंत इमेजों को हम मूर्तियों में सहज ही देख सकते हैं।भीड़ धर्म को पूरी तरह हजम कर जाती है।उसके स्रोत को भी हजम कर जाती है।इसमें भक्त के दर्शकीय भावबोध की बड़ी भूमिका है।कहने का तात्पर्य है कि ‘भीड़’ के आईने में ‘सोशल’ को देख ही नहीं सकते।अथवा सोशल के आईने में स्वयं को देख नहीं सकते। यह ऐसा आईना है जो टुकड़े -टुकड़े हो चुका है। इसमें कोई चीज नजर नहीं आती।

बौद्रिलार्द कहते हैं जो बातें ‘भीड़´ पर लागू होती हैं, वे सूचना पर भी लागू होती हैं।यदि आप ‘भीड़’ को विवेक के दायरे में लाना चाहेंगे तो बड़ी मुश्किल होगी।नैतिक तौर पर सही सूचना देने की कोशिश करेंगे तो मुश्किल होगी।बेहतर ढ़ंग से सामाजिक बनाना चाहेंगे तो निराशा हाथ लगेगी।’भीड़ ‘तो विवेकपूर्ण संप्रेषण के खिलाफ प्रतिवाद करती है।वह हर चीज को दर्शकीय भाव से देखती है।उसके लिए ‘नॉनसेंस’ को दिखाओ फिर उसे गंभीरता में रूपान्तरित करो।’नॉनसेंस’ उसको अपील करता है।वह किसी गंभीर ‘कोड’ या संहिता’ में बंधना नहीं चाहती।उसे तो ‘साइन’ या प्रतीक चाहिए।वह प्रतीक के साथ खेलती है ,उनका आदर्शीकरण करती है।उसे स्टीरियोटाइप पसंद है।वह ऐसे किसी भी कंटेंट को हजम कर जाएगी जिसका दर्शकीय अर्थ हो और जो देखने मे अच्छा हो।वे जो चीज खारिज करते हैं वह है ‘द्वंद्ववादी अर्थ´। वे राजनीतिक इच्छा शक्ति और पारदर्शिता को अस्वीकार करते हैं।वे किसी तार्किक और विवेकपूर्ण विमर्श को नहीं मानते, उनकी दिलचस्पी तो आधारहीन आयाम में प्रस्तुत चीजों में होती है।इस अर्थ में प्रतीक अपना अर्थ खो देते हैं।’भीड़’ मौन बहुसंख्यक समूह के रूप में काम करती है।वह अपने जीवन के भेदों की चर्चा नहीं करती।वह अपने मतभेदों को छिपा लेती है।

कहने का आशय यह कि ‘भीड़’ अपनी स्वाभाविक प्रकृति के अनुरूप काम नहीं करती।वह उन तत्वों से भी अनभिज्ञ है जो उन पर थोप दिए गए हैं।बल्कि उनके अंदर न जानने की भावना पैदा कर दी जाती है। यह उदासीनता उनमें सत्ता पैदा करती है।

प्रो.जगदीश्वर चतुर्वेदी-लेखक कोलकाता विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफ़ेसर और मीडिया विशेषज्ञ हैं।






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