प्रेम, धोखा और लालच से भरी बाबा रामदेव की कहानी

Posted on 07 Oct 2017 -by Watchdog

अरुण माहेश्वरी

 

बाबा शिरोमणि, बाबा रामदेव। बाबाओं की अभी की सारी कीर्तियों के अंधेरे आकाश में टिमटिमाते क़िस्सों के बीच यदि किसी एक बाबा की कहानी की हैसियत इस आसमान के चाँद की तरह हो सकती है तो वह रामदेव के अलावा शायद ही दूसरे किसी की होगी।

जब तक इन बाबाओं की गुफ़ाओं के राज नहीं खुलते है, ये सब परम संन्यासी होते हैं, अपरिग्रह और उसके आनंद-तत्त्व की जीवित मूर्ति। इनके सत्संग में दुनिया के परम भोगी भी ब्रह्मानन्द की दशा में अपना होश-हवास गँवा इस ‘माया जगत’ के बाहर पहुंच जाता है। आशाराम बापू के मंच पर हमने मोदी जी को उनके इशारों पर मंत्रों को बुदबुदाते देखा हैं , वाजपेयी को उनकी प्रशंसा में गदगद होते और आडवाणी को हाथ जोड़ कर सियाराम की भक्ति की हनुमान-मुद्रा में बार-बार देखा है।

और इन सब गुरुओं में जिसे गुरुघंटाल कहा जा सकता है, उस बाबा रामदेव को तो राजनीतिक नेताओं को चाबुक की फटकार से हाँकते इधर कई सालों से देखा जा रहा है। एक समय, जब मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ अन्ना हज़ारे का आंदोलन अपने शीर्ष पर था, प्रनब मुखर्जी समेत केंद्र के चार-चार मंत्री इसके स्वागत के लिये हवाई अड्डे पहुंच गये थे क्योंकि उन्हें इस बाबा के रोष को शांत करना था। हांलाकि उसकी आगे की कहानी थोड़ी अलग रही।

लेकिन जहाँ तक मोदी जी का सवाल है, इनका मंत्रिमंडल तो इस बाबा को गायत्री मंत्र के रचयिता ब्रह्मर्षि विश्वामित्र से कम नहीं मानता। इसने पतंजलि के योगदर्शन का शाप-मोचन कर उसे कसरत का नया रूप देकर इस सरकार के तो जैसे काम की पूरी दिशा ही बाँध दी ; हमेशा सस्ते और आसान रास्ते से बाजीमात करने की फिराक में रहने वाले मोदी जी को भारत को विश्वगुरु के रूप में स्थापित करने का एक ‘अचूक’ नुस्ख़ा दे दिया। बाक़ी सारे कामों को व्यर्थ जान, पिछले तीन सालों से वे इस कसरत-योग के प्रचार में ही तन-मन-धन देकर पूरे भक्तिभाव से लगे हुए हैं।

इसी बाबा ने भारत के संकट-मोचन के लिये आयकर नामक चीज को ही उठा देने का जो मंत्रोच्चार किया था उससे सबसे अधिक मंत्र-मुग्ध आज की मोदी-जेटली जुगल जोड़ी ही थी। भले इस जोड़ी ने वह काम नहीं किया लेकिन ऐसी प्रेरणा से ही भारत के इतिहास के उस अध्याय की पुनरावृत्ति जरूर की, जो तुगलकीपन के नाम से बदनाम है – नोटबंदी के एक धक्के से पूरी अर्थ-व्यवस्था को गर्त में डाल दिया और जिस बेहूदगी पर आज तक ये मंदबुद्धि लोगों की तरह तालियाँ बजा कर नाच रहे है कि देखो जो काम दूसरा कोई शासक नहीं कर सकता था, उसे हमने कर दिया। एक धक्के में भारत की अर्थ-व्यवस्था के पूर्ण मोक्ष का मार्ग खोल दिया।

आज के इस बाबा-युग में ऐसे बाबा शिरोमणि की गुफ़ा में किसी छोटे से सुराख से भी ताक-झाँक करने के लोभ का भला कोई भी लेखक-पत्रकार कैसे संवरण कर सकता है। प्रियंका पाठक-नारायण भी नहीं कर पाई। वह पिछले दस सालों से इस गेरुआधारी के चमत्कारी करतबों को देख रही थी, उसके पास के बहुत सारे लोगों से, प्रत्यक्ष विरोधियों से मिलने, बात करने का उसे मौका मिला है। उसके सेवादारों को भी उसने देखा-जाना और अंत में फिर जब वे अपने देखे-सुने को लिखने बैठी तो सामने आई यह बाबा शिरोमणि की कथा – बाबा रामदेव के जीवन पर आधारित ‘GODMAN To TYCOON‘।

यह किताब आज एक सबसे चर्चित किताबों में एक है। इसकी बिक्री 4 अगस्त के कोर्ट के एक आदेश के बावजूद नहीं रुक पाई है। बाबा ने इसे आदेश की अवमानना बताते हुए फिर से कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, किताब की लेखिका, प्रकाशक और अन्य को कारण बताओ नोटिस जारी किया, लेकिन यह किसी वर्चुअल स्पेश में नहीं, ठोस ज़मीनी यथार्थ में वायरल की तरह पसरती जा रही है। उच्च अदालत में इसके सर्कुलेशन पर रोक को चुनौती दी गई है।

बाबा कहते हैं, इसमें उनके जीवन के तथ्यों को अपमानजनक ढंग से पेश किया गया है। रामदेव की याचिका पर अदालत ने 4 अगस्त को अपने आदेश में कहा था कि पहली नजर में देखने से साफ है कि विवादित किताब पढ़ने पर पाठकों को लगेगा जैसे बाबा रामदेव एक अपराधी किस्म के व्यक्ति थे, जिन्होंने प्रसिद्धि, सफलता और पैसा पाने के लिए हर हद पार कर दी। ऐसी स्थिति में निश्चित रूप से याचिकाकर्ता की छवि को अपूरणीय क्षति होगी। और इसीलिये बाबा को राहत देते हुए इस किताब के प्रकाशन और बिक्री पर रोक लगा दी।

अब अदालत का यह फ़ैसला भी उच्चतर अदालत में एक विवादित विषय है। जो बाबा शिरोमणि भारतीय राज्य के शीर्ष पर होने का स्वाँग भरता है, उसे भारतीय पाठकों का गुरिल्ला युद्ध बुरी तरह से परेशान किये हुए हैं। इस किताब की चर्चा चारों ओर चल पड़ी है।

एक के बाद एक, उनके जीवन के सोपानों के रहस्यों से गूँथ कर बनाई गई इस अढ़ाई सौ पन्नों की रहस्य गाथा में वैसा ही प्रवाह है जैसा हम अक्सर तिलस्मी कहानियों या जासूसी उपन्यासों में पाते हैं।

हरियाणा के सैद अलिपुर गाँव के एक किसान का मरियल बेटा, जो खेती के काम का नहीं था, किसी रोगवश टेढ़ा देखने के कारण बचपन में गाँव का ‘काणिया’ रामकिशन यादव आज बाबा शिरोमणि बन कर भी अपना जन्म दिन किसी को नहीं बताता। 9 अप्रैल 1995 के दिन जब हरिद्वार में कणखल के कृपालुबाग आश्रम में प्रवेश के लिये उसने आश्रम के मालिक शंकर देव जी महाराज से गेरुआ वस्त्र धारण किया था, उस दिन को ही वह अपना जन्मदिन मानता है।

 

लेकिन प्रियंका की कहानी से ही आगे पता चलता है कि शंकर देव तो रामदेव के मित्र कर्मवीर से प्रभावित होकर उसे अपनी विरासत सौंपना चाहते थे। कर्मवीर आदर्शनिष्ठ आर्य समाजी था, उसे आश्रम की ज़िम्मेदारी अच्छी नहीं लगी क्योंकि वह उसके आर्यसमाजी विचारों के विपरीत मंदिर-पूजा की, घंटा-घड़ियालों की जगह थी। उसने शंकरदेव के प्रस्ताव को नहीं माना। लेकिन कुछ दिनों बाद असम के अपने किसी सेवा शिविर में रामदेव ने कर्मवीर को समझाया कि सेवा के अपने काम को चलाने के लिये ही हमें अपने पैरों के नीचे ज़मीन चाहिए, क्यों न हम कृपालुबाग में घुस जाते हैं !

और वहीं से कर्मवीर, रामदेव और बालकृष्ण तीनों मित्र शंकर देव के पास पहुंच गये। आश्रम की एक समस्या थी कि उसकी ज़मीन पर बने घरों में कई पुराने किरायेदार रहते थे, और शंकरदेव को चिंता थी कि उनके आँख मूँद लेने के बाद ये किरायेदार ही पूरे आश्रम की ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लेंगे। इसीलिये उन्होंने इन तीन मित्रों से एक करारनामा करके सभी किरायेदारों को उजाड़ने का इन्हें ठेका दे दिया। दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट का गठन हुआ जिसमें कर्मवीर ने रामदेव को अध्यक्ष बनवा दिया।

 

कहना न होगा, रामदेव के दिव्य योग मंदिर की आधारशिला रखी गई थी किरायेदारों को उजाड़ने के ठेके के साथ। यहीं पर रामदेव ने शंकरदेव का बाक़ायदा वारिस बनने के लिये अपने आर्यसमाजी सिद्धांतों की तिलांजलि देकर 9 अप्रैल 1995 के दिन शंकर देव के हाथ से गेरुआ वस्त्र धारण करके संन्यास लिया। अर्थात् संन्यास भी लिया संपत्ति के लिये ! इस किताब से ही यह भी पता चलता है कि बारह साल बाद 14 जुलाई 2007 के दिन अत्यंत रुग्ण अवस्था में वृद्ध और लगभग कंगाल शंकर देव, अर्थात रामदेव के मानस पिता जब अपने आश्रम से अचानक ग़ायब हो गये, उस समय अमेरिका के शिकागो शहर में डालर गिन रहे रामदेव के पास लौट कर इस विषय की सुध लेने की भी फ़ुर्सत नहीं थी ! 

 

रामदेव के दिव्या फ़ार्मेसी का लाइसेंस जिस विधिवत वैद्य स्वामी योगानंद के नाम पर था उस दीन-असहाय वैद्य की बाद में हत्या हो गई। रामदेव का सबसे क़रीबी दोस्त, एक प्रकार से पथ प्रदर्शक और शंकर देव के कणखल के कृपालुबाग आश्रम में रामदेव को ले जाने वाले कर्मवीर ने उसके क्रमश: खुल रहे लोभी चरित्र को देख कर उसका साथ छोड़ दिया था। 25 मार्च 2005 के दिन बिना किसी से कहे एक गाड़ी में बैठ कर कृपालु बाग़ आश्रम से वह चला गया।

कृपालुबाग आश्रम में ही 1997 में दस-बारह लोगों को लेकर रामदेव का पहला योग शिविर लगा था। जड़ी-बूटियों और आयुर्वेदिक दवाओं के जानकार बालकृष्ण के च्यवनप्रकाश को साइकिल पर घर-घर बेचने के बाद उसकी दवाओं का उत्पादन दिव्या फ़ार्मेसी के लेबल में शुरू हुआ।

सन् 2000 में रामदेव का इलाहाबाद के एक पत्रकार माधव कांत मिश्रा के मार्फ़त ‘आस्था’और ‘संस्कार’ धार्मिक चैनलों से जो संपर्क हुआ, इन चैनलों की बदौलत रामदेव देश के घर-घर में पहुंच गया, देश-विदेश में उसके शिविरों में भीड़ उमड़े लगी और रामदेव योग कसरत के तूफ़ानी दौरों से दोनों हाथों से रुपये बटोरने लगा। राजनीतिज्ञों ने भी उसके दरबार में हाज़िरी लगा-लगा कर उसे प्रकृत अर्थों आज के काल का बाबा शिरोमणि बना दिया।

प्रियंका ने काफी विस्तार के साथ ‘आस्था‘ चैनल के मालिक किरीत मेहता और ‘संस्कार‘ के काबरा आदि के साथ रामदेव के व्यवहार की, हरिद्वार बुला कर एक बंद कमरे में डरा-धमका कर किरीत मेहता से उसके चैनल के सारे शेयरों को अपने नाम लिखा लेने की कहानी सुनाई है। आज इन दोनों चैनलों की पूरी मिल्कियत रामदेव की कंपनियों के पास ही है।

इस किताब में एक बहुत ही दिलचस्प चरित्र आता है राजीव दीक्षित का। योग कसरत गुरू का कायांतर एक स्वदेशी के प्रचारक गुरू के रूप में करने वाले राजीव दीक्षित का। वह रामदेव के संपर्क में 2008 में आता है। उसके साथ मिल कर ‘भारत स्वाभिमान आंदोलन‘ का प्रारंभ होता है जो राजनीति के क्षेत्र में रामदेव के सीधे प्रवेश की सूचना थी। इसके साथ मिल कर ही रामदेव ने भारत स्वाभिमान यात्रा की। लेकिन इस यात्रा के दो महीने बाद ही 30 नवंबर 2010 को अपने 42 वें जन्मदिन पर छत्तीसगढ़ के बेमेतारा में आर्य समाज के एक होस्ट हाउस में राजीव मरा हुआ पाया जाता है। प्रियंका ने राजीव की इस असमय मृत्यु और हरिद्वार में उसके दाह-संस्कार के विषय पर विस्तार से लिखा है जिससे पता चलता है कि राजीव के क़रीबी लोगों की तीव्र माँग के बावजूद रामदेव ने सिर्फ अपनी ताकत के बल पर राजीव के शव का पोस्ट मार्टम नहीं होने दिया।

इसी प्रकार इस किताब में और भी कई चरित्र आते हैं जिनके बयानों से पता चलता है कि रामदेव अपने संपर्क में आने वाले लोगों को चूस कर, मसल कर कैसे अपने कारोबार का विस्तार करता चला गया है।

 

इसमें एक अध्याय ‘बृंदा करात का प्रवेश’ शीर्षक से है जिसमें पतंजलि के कर्मचारियों के साथ घनघोर अन्याय के विरोध में सीआईटीयू के साथ बृंदा की रामदेव से टक्कर होती है। कर्मचारियों के सहयोग से ही बृंदा रामदेव की औषधियों में अघोषित पदार्थों के प्रयोग का मुद्दा भी उठाती है। रामदेव ने मीडिया और राजनीतिज्ञों के बीच अपने असर और पैसों के बल पर बृंदा को विदेशी कंपनियों का दलाल बताते हुए उसके खिलाफ जो अभियान चलाया, उससे रामदेव ने राजनीतिक विरोधियों पर हावी होने का गुर सीख लिया जो आगे भी उसके काम आता रहा।

और इसी घटना से यह भी जाहिर हुआ कि अपने उत्पादों में मिलावट करने से रामदेव को जरा भी परहेज़ नहीं है। उनकी यह प्रवृत्ति कैसे उनके कारोबार के विस्तार के साथ प्रबल से प्रस्तर होती चली गई, प्रियंका पतंजलि के कई उत्पादों , खास तौर उसके घी, मंजन आदि की गड़बड़ियों के ब्यौरे से बताती है। दूसरी जगहों से सफ़ेद मक्खन को मँगा कर उसे पिघला कर वह गाय के दूध से बने शुद्ध घी के तौर पर बेचता है। इस सफ़ेद मक्खन में गाय, भैंस, बकरी और दूसरे किसी जानवर का दूध मिला हो सकता है, इसकी उसे कोई परवाह नहीं है। विभिन्न जगह से बटोर कर लाये गये उत्पादों पर अपना ठप्पा लगा कर बेचना, रामदेव का आज प्रमुख धंधा है।

 

इस पूरी किताब का सबसे दिलचस्प चरित्र है – बालकृष्ण, रामदेव का दाहिना हाथ और पतंजलि की सभी कंपनियों के लगभग 90 प्रतिशत शेयर का मालिक। रामदेव ने अपने संन्यासी रूप की प्रामाणिकता को कायम रखने के लिये अपने और अपने परिवार के लोगों के नाम एक प्रतिशत शेयर भी नहीं रखा है, लेकिन इस किताब का हर पन्ना उनके लोभी और षड़यंत्रकारी अपराधी प्रवृत्ति वाले चरित्र की गवाही देता है। ऐसे में आज रामदेव और बालकृष्ण के बीच का संबंध हमें एक बहुत बड़े रहस्य की गुत्थी जैसा लगता है, और हमारी नज़र में इस बाबा शिरोमणि की आगे क्या गति रहेगी, इसका अनुमान इस संबंध की गति से ही सबसे प्रकट रूप में सामने आयेगी।

 

कुल मिला कर बाबा रामदेव की यह कहानी प्रेम,  धोखा की तरह की ही एक लोमहर्षक कहानी की तरह है। वैसे भी बाबाओं का हर मामला ऊपर से जितना सुलझा हुआ दिखाई देता है, भीतर से उतना ही उलझा हुआ होता है।इसीलिये इसके हर अंश के आख्यान में रहस्यों से जुड़ा रोमांचकारी आकर्षण शुरू से अंत तक बना रहता है। इसमें कोई शक नहीं है कि इस बाबा शिरोमणि का जब भी पूरा भांडा फूटेगा, उसके विस्फोट के धक्के में राजनीतिक गलियारों के भी अनेक कोने हिलते हुए दिखाई देंगे।

हम जानते हैं इन बाबाओं का अनियंत्रित लोभ और इनकी बेक़ाबू वासनाएँ इनके अंत का प्रमुख कारण होती हैं। रामदेव ने बाक़ायदा एक बड़े व्यापारी घराने का रूप ले लिया है। इसीलिये उसके पास यह रास्ता खुला हुआ है कि कभी भी वह अपने को शुद्ध व्यापारी घोषित करके संन्यास की चादर को उतार फेंके। अन्यथा उनके चरित्र की अभी से प्रकट हो रही विसंगतियाँ कब उन्हें आशारामों, रामपालों और गुरमीतों की पंगत में बैठा देगी, ख़ुद उन्हें पता भी नहीं चलेगा।

प्रियंका पाठक नारायण ने कड़ी मेहनत से, तमाम प्रामाणिक स्रोतों को आधार बना कर इस बाबा-व्यापारी शिरोमणि की जो कहानी कही है, उसके लिये उन्हें साधुवाद। 

(अरुण माहेश्वरी  जाने-माने साहित्यकार हैं। )






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