मीडिया में दलित व अल्पसंख्यक के खिलाफ हिकारत कूट-कूट कर भरी हुई है

Posted on 07 Oct 2017 -by Watchdog

उर्मिलेश-

ज्यादातर न्यूज चैनलों ने भीम आर्मी के नेता एडवोकेट चंद्रशेखर आजाद की गिरफ्तारी की खबर कुछ इस तरह पेश की: ‘भीम आर्मी का चीफ चंद्रशेखर गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस को उसकी काफी दिनों से तलाश थी।’ खबर की इन दो पंक्तियों में चंद्रशेखर को अनादर, हिकारत और ओछे ढंग से देखने और संबोधित करने का भाव साफ झलकता है, मानो वह कोई सामाजिक कार्यकर्ता और एक एडवोकेट न होकर एक अपराधी या असामाजिक तत्व हों! मजे की बात है कि हिंदी के बेहतर, टीआरपी के दबाव से कुछ मुक्त और अपेक्षाकृत ठीक-ठाक पत्रकारिता में यकीन रखने का दावा करने वाले एक बहुचर्चित न्यूज चैनल की 8 बजे की खबर भी आज कुछ इसी तरह की थी। क्या किसी दलित-बहुजन नेता या कार्यकर्ता को भारत का मुख्यधारा मीडिया (खासकर न्यूज चैनल) आज भी वाजिब सम्मान के साथ संबोधित करना नहीं चाहता? 

मैं निजी तौर पर चंद्रशेखर को न तो जानता हूं और न कभी मिला हूं। पर मुझे लगता है, अशोक भारती और जिग्नेश मेवाणी जैसे नये सोच के दलित नेताओं की तरह चंद्रशेखर भी हमारे देश के सर्वाधिक उत्पीड़ित समुदायों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। वह वाजिब सम्मान के पात्र हैं। क्या ऐसा नहीं करने वाले चैनल अपनी अगली बुलेटिन में अपनी गलती के लिए माफी मांगकर अपने पेशेवर होने का सबूत देंगे? 

 

हिमांशु कुमार-

 

कल भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर गिरफ्तार किये गए. मुझे लगता है अगर उन्होंने जंतर मंतर पर ही गिरफ्तारी दी होती तो उसका असर ज्यादा सकारात्मक होता.

चिंता की कोई बात नहीं है चन्द्रशेखर ने कोई जुर्म नहीं किया है, वह जल्द ही जेल से बाहर आ जायेंगे, मेरी आपत्ति उनकी गिरफ्तारी पर मुख्यधारा मीडिया द्वारा प्रकाशित खबरों के तरीके को लेकर है.

भाषा न्यूज एजेंसी द्वारा खबर प्रकाशित करी गयी कि सहारनपुर जातीय हिंसा का आरोपी और भीम आर्मी का चीफ चन्द्रशेखर गिरफ्तार,  एनडीटीवी ने भी इसी शीर्षक से खबर अपनी वेबसाईट पर लगाई है.

इसी तरह अमर उजाला ने भी लिखा है कि सहारनपुर दंगों का आरोपी गिरफ्तार हो गया है.

यह शरारत पूर्ण रिपोर्टिंग है, सब जानते हैं कि सहारनपुर की जातीय हिंसा सवर्णों द्वारा दलितों के घरों पर एकतरफा हमला था, भीम आर्मी का इसमें कोई दोष नहीं था,

इस घटना के तीन दिन बाद पुलिस द्वारा दलित युवाओं की बैठक ना होने देने के बाद जो तोड़फोड़ हुई उसमें भी चन्द्रशेखर मौजूद नहीं थे.

हमारी बात खुद जिलाधिकारी से हुई थी, उन्होंने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की टीम को बताया था कि चन्द्रशेखर को मैंने फोन करके प्रदर्शन स्थल पर बुलाया था और चन्द्रशेखर ने वहाँ आकर भीड़ को समझा कर तोड़फोड़ बंद करवाई थी.

इसके बावजूद भी चन्द्रशेखर को एक बड़े अपराधी की तरह प्रदर्शित करना भारतीय मीडिया के जातिगत सवर्ण वर्चस्व का सबूत है. हमारा मीडिया हर बार दलितों के विरुद्ध, मुसलमानों के विरुद्ध और आदिवासियों के विरुद्ध रिपोर्टिंग करता है,

और पीड़ितों को ही अपराधी बताता है, सोनी सोरी को नक्सली कह कर बदनाम किया गया, मुज़फ्फर नगर दंगों से पहले मारे गए निर्दोष शाहनवाज़ को लडकी छेड़ने वाला कह कर झूठा बदनाम किया जबकि पूरा झगड़ा साइकिल टकराने का था.

अगर मीडिया भारत के प्रभावशाली समुदाय को खुश करने वाली खबरें ही दिखायेगा, तो इस समाज को अपनी गलतियां कभी पता नहीं चलेंगी. और भारत का प्रभावशाली समाज हमेशा जातिवादी, साम्प्रदायिक और अमीर परस्त बना रहेगा.

और यहाँ दलित, अल्पसंख्यक, आदिवासी महिलायें और छात्र हमेशा अपराधी मानी जाते रहेंगे, और सरकारी दमन का शिकार बनते रहेंगे,  हमें इस दिशा में जल्द ही काम करना पड़ेगा. 

 

राज्यसभा टीवी के कार्यकारी संपादक रह चुके उर्मिलेश एवं गांधीवादी एक्टिविस्ट हिमांशु कुमार की एफबी वाॅल से 






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