एक पत्रकार जो मरकर भी पत्रकारिता को ज़िदा रखता है !

Posted on 07 Oct 2017 -by Watchdog

विनीत कुमार – 

 

कृषि विज्ञान केन्द्र, सिरसा का वो सभागार खचाखच भरा था. यदि कोई खड़े होकर मंच पर हो रही बातचीत सुनना चाहता तो उसे एक पैर पर खड़ा रहना होता. दोनों पैर पर खड़े होने तक की जगह नहीं थी. कुर्सियों की दो लाइन के बीच की जगह में लोग पहले ही बैठ चुके थे. मतलब एक बार आप इस हॉल में घुस गए तो निकलने की गुंजाईश नहीं थी.

ये नजारा था ‘पूरा सच’ के उसी संपादक की याद में छत्रपति सम्मान समारोह का जिसकी जनहित में पत्रकारिता किए जाने पर हत्या कर दी गयी थी. शहीद संपादक राम चन्द्र छत्रपति का परिवार और उनके दोस्त, उनकी याद में हर साल देश के ऐसे पत्रकार/ मीडियाकर्मी को सम्मानित करते हैं जिन पर उनका यकीं होता है कि वो लगभग वैसी ही पत्रकारिता कर रहे हैं जैसा कि उनका दोस्त, पिता, संपादक छत्रपति ने किया और अपने मूल्यों को सहजते हुए बिना किसी समझौते के अपने बीच से चला गया.

जिस दोपहर मैं सिरसा के इस कार्यक्रम में पहुंचा था, एक रात पहले एनडीटीवी इंडिया के प्राइम टाइम कार्यक्रम में था. सभागार के सामने से गुजरते ही कई लोगों ने मुझे पहचान लिया- आप रात में बोल रहे थे न..उसके थोड़ी देर बाद मैंने देखा कि कुछ लोग मेरा अतिरिक्त ख्याल रखने लग जा रहे हैं. कई बार कहा कि आपलोग अपनी आवाज मत बंद कीजिएगा. बोलते-लिखते रहिए..मरना तो एक दिन सबको है..खैर

मैं सभागार के एक कौने में जाकर बैठ गया और वक्ताओं को सुनने लग गया. जेएनयू के प्रोफेसर चमनलाल उस दोपहर रौ में थे. छत्रपति की पत्रकारिता, एक संपादक के तौर पर उनकी दिलेरी पर बात करते-करते उन्होंने बाबा राम रहीम पर वो सबकुछ बोला जिसका एक हिस्सा अखबार और समाचार चैनलों में लूप होकर घूम रहे हैं. लोग एकटक चमनलाल को देख रहे थे, एक भी ऐसा शख्स नहीं था जो वहां से हिला हो. बहुमत की सरकार के माहौल में वो चमनलाल को उनके खिलाफ बोलते हुए सुन रहे थे.

कार्यक्रम के अंत में छत्रपति से जुड़े लोगों ने बोलना शुरू किया. उन पर कही गयी एक पंक्ति मेरे भीतर जाकर अटक गयी- वो हमारे बीच से तो चले गए लेकिन हम सबको भी पत्रकार की ही तरह जीना सिखा गए. इस पंक्ति में जाने क्या असर था कि मैं फफक पड़ा. थोड़ी मुश्किल हुई लेकिन किसी तरह बाहर निकल आया. अटकी हुई ये पंक्ति रूलाई में घुलती चली गयी. मन एकदम से उचट गया. थोड़ी देर बाद सामान्य होने की कोशिश की. छत्रपति को जिस तरह का साहित्य और रचनाएं पसंद थी, उनकी बुक स्टॉल लगी थी. उनमे कुछ किताबें खोजने लगा. गोरखपुर के इतिहासकार और प्रतिबद्ध शिक्षक श्रीवास्तव सर की किताब ‘लाल कुर्ता’ दिख गयी. खरीदते ही फोन किया- सर मिल गयी आपकी किताब, अब आप मत भेजिएगा. निन्यानवे साल के उस बुजुर्ग की आवाज में अचानक से गर्माहट आ गयी थी. उन्हें शायद लगा हो कि इस लड़के ने चलताउ ढंग से नहीं कहा था कि मैं आपकी किताब खरीद लूंगा.

सभागार में वापस पहुंचने पर कार्यक्रम लगभग अंतिम चरण में था. मैंने कभी रामचन्द्र छत्रपति को देखा नहीं था. ठीक वैसे ही जैसे भारतेन्दु या गणेश शंकर विद्यार्थी को नहीं देखा था. लेकिन उनके बारे में जितना सुना, लगा वो भी इनकी ही तरह होंगे. मैं छत्रपति के दोस्तों, परिवार के लोगों के बारे में सोचने लगा- कितना मुश्किल होता होगा इस समारोह के बहाने हर बार उन्हें याद कर पाना. ऐसे दौर में उस पत्रकारिता और संपादकीय साहस को याद कर पाना जबकि संपादक अपनी रीढ लगभग गंवा चुके हैं. ये सब लिखते हुए मुझे राहुल कंवल से लेकर बाकी चैनलों के एक-एक करके वो सारे संपादक याद आ जा रहे हैं जो बाबा राम रहीम की फिल्म रिलीज होने के मौके पर सिरसा की तरफ दौड़ लगाने लग गए थे और टीवी स्क्रीन पर एक-एक करके एक्सक्लूसिव की पट्टी चलने लगी थी.

तब मैं लगातार इस सिरे से सोचने लग जा रहा हूं कि आखिर छत्रपति ने अपने परिवार और दोस्तों के बीच ऐसी कौन ट्रेनिंग या फीलिंग्स पैदा की होगी कि वो उन्हें गंवाकर भी अपने को खतरे में डालने के लिए तैयार रहे…और हमारा कारोबारी मीडिया ऐसा क्या करता आया है कि जलकर राख हो चुकी ओबी बैन के विजुअल्स पर संपादकों के कोजी इंटरव्यू हावी हो जा रहे हैं ?

कारोबारी मीडिया जिस तेजी से जनतंत्र को मॉब लिंचिंग टूल में तब्दील करने पर आमादा है, मेरे भीतर इस बात का यकीं अब भी गहरा है कि एक मीडियाकर्मी, एक पत्रकार अपने पेशे के प्रति न्यूनतम ही सही ईमानदारी बरतता है तो इसी मॉब के बीच से सिरसा के सभागार में मौजूद लोगों की तरह ही जनतंत्र बचा रह जाता है. जनतंत्र का एक संस्करण हमेशा मौजूद रहेगा जो मूल्यों और अधिकारों के साथ खड़ा होगा. आखिर सिरसा में भी तो लोग उसी रिस्क के साथ जुटे थे जो रिस्क लेकर पंचकूला में मीडियाकर्मी कवरेज के लिए मौजूद हैं.

छत्रपति सम्मान समारोह बहुत भव्य नहीं हुआ करता है. बहुत ही कम लागत में सादे ढंग का आयोजन होता है. लेकिन उस सादे आयोजन में भी इस बात का एहसास गहरा होता है कि पत्रकारिता यदि समझौता कर ले तो मौत के सौदे की जमीन तैयार हो जाती है और इस जमीन पर खुद मीडियाकर्मी का परास्त होना अस्वाभाविक नहीं है. ऐसे में यह बेहद जरूरी है कि मीडिया जिसे बिजनेस मॉडल और प्रोफेशनलिज्म का हिस्सा बताकर अपना रहा है, एक बार क्रॉस चेक कर ले कि कहीं अपनी ही मौत के साधन तो नहीं जुटा रहा ?  स्टूडियो से सवाल दाग रहे एंकर-संपादक इसे भले ही शिद्दत से महसूस न करें लेकिन जो फील्ड में जूझ रहा है, जो कैमरे के साथ मोर्चे पर मौजूद है, उसे पता है कि वो जनतंत्र से खिसककर कहां जा गिरा है और उसका क्या हश्र होने जा रहा है ?

आज ओबी बैन राख कर दिए जाने पर आवाज में भले ही तल्खी हो लेकिन कल…? कल तो फिर अपने ही खिलाफ, जनतंत्र के खिलाफ खड़ा होना है क्योंकि इस पैटर्न से बाहर निकल पाना इतना आसान भी तो नहीं.. लेकिन इतना तो जरूर है कि न्याय की संभावना पैटर्न की पत्रकारिता से नहीं, छत्रपति जैसे संपादक के पैटर्न तोड़कर पत्रकारिता किए जाने पर बची रहती है.

विनीत कुमार मीडिया शिक्षक हैं। चर्चित किताब ‘मंडी में मीडिया ‘के लेखक भी। 






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